भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्माद्धि काव्यं मधुर तस्माद् अपि सुभाषितम् ।।
संस्कृत भाषा में वस्तुतः हजारों सुभाषित हैं। हम कुछ चुनिंदा सुभाषितों को जानने वाले हैं। अभी हमें इसके बारे में क्यों जानना चाहिए इसका उत्तर उपरोक्त सुभाषित में दिया गया है। इसका का मतलब है - सभी भाषाओं में संस्कृत प्रमुख भाषा है। क्योंकि उससे अनेक भाषाओं का निर्माण हुआ है। यह भाषा गीर्वाणभारती कहलाती है। गीर्देवी सरस्वती के नामों में से एक है। गीर् का अर्थ है भाषा और वाण का अर्थ है तीर! भाषा उसका हथियार है। वह सरस्वती भी है! इस सरस्वती की भारती का अर्थ फिर से भाषा है। संस्कृत भाषा वास्तव में सरस्वती या सरस्वती की भाषा है ! इसलिए यह दिव्य भी है, और उसके साथ मधुर भी है। श्रृतिमधुर, नादमधुर, अर्थमधुर! वास्तव में, इस भाषा में विभिन्न प्रकार की साहित्य सामग्री है। गणित है, भौतिक विज्ञान है, वास्तुकला है, विभिन्न विज्ञानों की पुस्तकें (ग्रंथ) संस्कृत भाषा में हैं लेकिन इतनी मधुर संस्कृत भाषा में यदि कुछ अधिक मधुर है तो वह संस्कृत का काव्य है! यानी ललित साहित्य! और ऐसे मधुर काव्य से चुने हुए विचार सुभाषित तो और भी मधुर हैं।
सुभाषितम् एकवचन जाति है। अर्थात समस्त सुभाषित साहित्य ! सुभाषित का मतलब अच्छी बातें करना। हर तरह से अच्छा। मराठी-हिंदी जैसी भाषाओं में भी सुभाषित हैं, पर मुख्यतः गद्य में! संस्कृत में ये सुभाषित पद्य में हैं और आसानी से जिह्वा पर बैठ जाते हैं। (जीभ को सरस्वती भी कहते हैं!) और सुभासिता के विचारों को यदा-कदा लेखकों द्वारा अपने लेखन में और वक्ताओं द्वारा अपने भाषणों में आसानी से उद्धृत किया जा सकता है। हमारा अपना व्यावहारिक ज्ञान भी इससे बढ़ता है।
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