शनिवार, 31 दिसंबर 2022

क्या भारत खाद्य तेल में आत्मनिर्भर हो जाएगा?

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2030 तक देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की घोषणा की है। यानी उसके बाद आयात को पूरी तरह बंद करने का संकल्प जताया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी की घोषणा मध्यम अवधि में खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों की पृष्ठभूमि है। मौजूदा वैश्वीकरण विरोधी लहर के साथ-साथ बढ़ते आयात-निर्यात का अंतर, रुपये और डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं में गिरावट देखते  यह दृढ़ संकल्प सही है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या घरेलू हालात, सरकार की नीतियां इसके लिए अनुकूल हैं। जनसंख्या, आय में वृद्धि, बढ़ता शहरीकरण, उपभोक्तावाद में उछाल खाद्य तेल की मांग में लगातार वृद्धि कर रहा है।

छोटी अवधि (1994-95 से 2014-15) के दौरान खाद्य तेल की प्रति व्यक्ति खपत 7.3 किलोग्राम से बढ़कर 18.3 किग्रा हो गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस दौरान यह और बढ़ेगा। भारत खाद्य तेल की खपत में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। मांग के अनुपात में उत्पादन नहीं बढ़ने के कारण आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत ने दुनिया के सबसे बड़े आयातक के रूप में प्रतिष्ठा स्थापित की है। आंकड़े अकेले नवंबर महीने में आयात में 34 फीसदी की बढ़ोतरी दिखा रहे हैं। खनिज तेल के बाद आयात में खाद्य तेल का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण क्रमांक लगता है। इसलिए बढ़ते व्यापार घाटे में खनिज तेल जितना ही इस तेल का भी योगदान है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख तिलहन उत्पादक राज्य माने जाते हैं। इस में महाराष्ट्र शीर्ष पर है और मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है।

खाद्य तेल की मांग बढ़ रही है, लेकिन खेती और उत्पादकता के तहत क्षेत्र नहीं बढ़ रहा है। पिछले दो दशकों से मानो उत्पादकता स्थिर है।  2015-16 में 795 किग्रा  प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 2019-20 में 925 किलोग्राम हो गई है, बस इतना ही बदलाव है! तिलहन की खेती का क्षेत्रफल बढ़ नहीं रहा है क्योंकि सोयाबीन आदि तिलहनों की जगह गन्ना, केला, रबर जैसी फसलों ने ले ली है। किसानों का पक्ष जीतने के लिए सरकार द्वारा तिलहन के लिए गारंटीकृत मूल्य की घोषणा की जाती है। लेकिन चूंकि बाजार में कीमत गिरने के बाद खरीद की जाती है, इसलिए किसान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। अध्ययनों से पता चला है कि तेल आयात पर कर की दर और आत्मनिर्भरता के विकल्प के रूप में घरेलू उत्पादन के बीच घनिष्ठ संबंध है। यदि कर की दर कम है, तो आयात बढ़ने पर घरेलू उत्पाद नहीं बढ़ता है। यदि कर अधिक होता है, तो आयात अधिक महंगा हो जाता है और घरेलू उत्पादन में वृद्धि होती है और देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता है। अमेरिका और जापान सहित सभी उन्नत देशों ने अपने विकास के प्रारंभिक चरणों में आयात पर उच्च कर लगाकर अपने घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा से बचाया था।

खाद्य तेल के आयात पर शुल्क लगाने के संबंध में दीर्घकालिक नीति का अभाव प्रतीत होता है। अब तक की नीतियों से स्पष्ट है कि किसानों के ऊपर उपभोक्ताओं और व्यापारियों के हितों को प्राथमिकता दी गई है। कुछ महीने पहले खाद्य तेल की कीमतों को लेकर काफी हंगामे के बाद सोयाबीन, सूरजमुखी, पाम तेल पर का कर पहले से ही घटाकर शून्य प्रतिशत कर दिया गया था। चूंकि खाद्य तेल के आयात को पहले ही लाइसेंस मुक्त (ओजीएल) कर दिया गया है, इसलिए आयात में वृद्धि से कीमतों में तेज गिरावट आई है। सोयाबीन तेल की कीमत 200 रुपये (प्रति किलो) से तेजी से गिरकर 160 रुपये पर आ गई। शून्य प्रतिशत कर छूट 2023-24 तक जारी रहेगी। इसका मतलब यह है कि तब तक सोयाबीन सहित सभी तिलहनों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना नहीं है। अगर रेट किसान के लिए फायदेमंद नहीं हैं तो सवाल उठता है कि उत्पादन कैसे बढ़ेगा?

लोकसभा चुनाव 2024 में हैं। ऐसा लगता है कि चुनाव संपन्न होने तक सत्ताधारियों ने इस बात का ध्यान रखा है कि तेल की कीमतों को लेकर जनता में नाराज़गी पैदा न हो। अटल बिहारी के नेतृत्व वाली सरकार के समय यही दर 70 प्रतिशत थी और इसके सकारात्मक परिणाम तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के रूप में भी देखने को मिले। अभी तक कोई भी देश घरेलू उत्पादन बढ़ाए बिना आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर पाया है। कम आयात शुल्क और आत्मनिर्भरता के बीच विरोधाभास पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। शून्य प्रतिशत कर और अप्रतिबंधित आयात आत्मनिर्भरता नहीं बल्कि निर्भरता की ओर ले जाते हैं। भारत के मामले में भी यही हो रहा है। तेल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने न केवल आयात शुल्क की दर को शून्य कर दिया, बल्कि व्यापारियों, स्टॉकिस्टों और तेल उत्पादकों द्वारा तिलहन और तेल के भंडारण की सीमा निर्धारित करके इसे सख्ती से लागू किया। इससे तिलहन की कीमतों में गिरावट आई है। जाहिर तौर पर इसका असर किसानों पर पड़ा।  यह सीमा 31 दिसंबर तक रहेगी। यानी तब तक रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी, उसके बाद अगर रेट बढ़ता है तो इससे किसानों को कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि उस समय किसान के पास बेचने के लिए सोयाबीन नहीं होगा.  जीएम बीजों पर सरकार की नीति इसी तरह भ्रमित करने वाली है।  कई देशों ने जीएम बीजों के प्रयोग से उत्पादन बढ़ाया है और लागत कम की है।

हालांकि, हमारे यहां ऐसे बीजों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। कई स्थगन के बाद जीएम सरसों के उपयोग की अनुमति दी गई। यह भी सीमित बीज उत्पादन के लिए  है। इसके बारे में मजेदार बात यह है कि भले ही हमारे पास ऐसे बीजों पर प्रतिबंध है, जीएम बीजों का व्यापक रूप से उन देशों में उपयोग किया जाता है जहां से भारत खाद्य तेल आयात करता है (ब्राजील, अर्जेंटीना, यूक्रेन)।  सरकार को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिख रहा है। बी  वी  मेहता, जो कभी सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक थे, ने 2013 में खाद्य तेल के बढ़ते आयात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह देश और किसानों के लिए खतरनाक है। नतीजा वही रहा।  2010 में देश का 42 फीसदी खाद्य तेल आयात होता था, अब यह आंकड़ा 60-70 फीसदी हो गया है। अगर घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयास नहीं किए गए तो यह और बढ़ सकता है। मोदी के संकल्प के अनुरूप देश 2030 तक खाद्य तेल में आत्मनिर्भर हो सकता है। वह क्षमता निश्चित रूप से हमारे किसानों में मौजूद है। उन्होंने सत्तर के दशक में देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाकर भी दिखाया है। केवल गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई की सुविधा, खाद देने से उत्पादन नहीं बढ़ेगा बल्कि उत्पादन लागत और खरीद गारंटी के आधार पर गारंटीकृत मूल्य के साथ आयातित तेलों पर कर की दर बढ़ाकर इसे लाइसेंस मुक्त सूची से बाहर कर दिया जाए तो ही प्रधानमंत्री मोदी का सपना बन सकता है। , अन्यथा नहीं। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, सांगली। महाराष्ट्र।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

(बाल कहानी) सेवा का फल

मोरगाँव नाम का एक गाँव था। उस गाँव में नंदू नाम का एक बहुत गरीब;  लेकिन मेहनती और परोपकारी लड़का था। उसके घर की स्थिति बहुत ही खराब थी। इसलिए उसे बचपन से ही छोटे-मोटे काम करने पड़ते थे। ऐसे छोटे-छोटे दैनिक कार्य करके वो अपनी शिक्षा का खर्च चला रहा था। नंदू के मोरगांव में सरकारी अस्पताल बनने से गांव के साथ साथ आसपास के गांवों के मरीजों की भी सुविधा हो गई। शहर के महंगे निजी अस्पतालों में गरीब नहीं जा पाता था। लिहाजा इस अस्पताल में लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गई। जाहिर है, अस्पताल की व्यस्तता भी बढ़ी। एक बार अचानक आसपास के गांवों में किसी तरह की बीमारी फैल गई। बुजुर्ग नागरिकों को अचानक बुखार आ जाता था, हाथ-पैर के जोड़, घुटने बहुत सख्त हो जाते थे और उनके हाथ- पाँव की ताकत चली जाती थी। अस्पताल में अचानक बुजुर्ग मरीजों की संख्या बढ़ गई।परिचारक उनकी सेवा करने में असफल होने लगे।  नंदू यह जानता था। उसने मरीजों की सेवा करने के लिए रोज सुबह-शाम अस्पताल जाने का फैसला किया। 

शाम को वह तुरंत अस्पताल गया। वहां जाकर उसने सबसे पहले वहां के मुख्य चिकित्सक से मुलाकात की। डॉक्टर उसके इस उदार रवैये से अच्छी तरह वाकिफ थे। वे नंदू के फैसले से खुश थे। उन्होंने झट से नंदू को हाँ कर दी। उसी दिन से नंदू की  मरीजों की देखभाल शुरू हो गई। 

कई दादा-दादी के पास अस्पताल में रहने के लिए कोई करीबी या दूर का रिश्तेदार नहीं था। ऐसे रोगियों को समय पर उचित दवा देना, जो लोग ठीक से खा नहीं सकते उन्हें अपने हाथों से खिलाना, गर्म पानी की थैली से उनके जोड़ों को भूनना, तेल मालिश करना, कपड़े को गर्म पानी में भिगोकर निचोड़ कर निकाल लेना और गर्म गीले कपड़े से  मरीजों के बदन पोंछ लेना, अस्पताल की चादरें गर्म पानी से धोना ऐसा काम वह खुशी-खुशी सुबह-शाम  करने लगा। 

जब दिनेश जैसे उसके करीबी दोस्तों को पता चला कि नंदू अस्पताल में सेवा दे रहा है, तो वे नंदू के साथ मरीजों की सेवा के लिए वहां आने लगे। डॉक्टरों का काम भी आसान हो गया। सभी के सहयोग से अस्पताल में प्रतिदिन सफाई अभियान चलाया गया। नतीजा यह हुआ कि बीमारी भाग गई। सभी दादा-दादी ठीक हो गए। डॉक्टर ने नंदू की सेवा से प्रसन्न होकर इसकी सूचना शासन को दी। जिलाधिकारी ने भव्य समारोह में नंदू को सम्मानित किया। समाचार पत्रों ने भी उसकी उपलब्धियों पर ध्यान दिया। सभी ग्रामीणों ने उसकी प्रशंसा की। उनकी स्तुति के शब्द सुनकर नंदू बहुत प्रसन्न हुआ। दिलचस्प बात यह है कि जब उस अस्पताल के सभी डॉक्टरों ने उसकी आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी ली तो उसे लगा कि उसके काम का वाकई सार्थक हो गया। बड़े होने पर उसने डॉक्टर बनने का फैसला किया। -प्रा. देवबा पाटील (अनुवाद- मच्छिंद्र ऐनापुरे) 

(बालकहानी) श्रुति का संकल्प

आज 31 दिसंबर है।  श्रुति थोड़ी परेशान होकर घर आई। उसका कारण भी वैसाही था। क्लास में, उसकी मैडम ने उससे नए साल का संकल्प मांगा। वह परेशान थी क्योंकि वह दूसरों से अलग संकल्प नहीं कह सकी थी। ऐसे ही वह घर आ गई और तुरंत अपनी मां के साथ मौसी के पास चली गई। वहां मौसी की बेटी का जन्मदिन था। भोजन योजना बहुत बढ़िया थी। गुलाब जाम, केक, कचौरी और पुलाव सब कुछ श्रुति के पसंद का था। पर उसने एक ही गुलाबजाम खाया और डिश बेसिन में रख दी। मौसी ने देख लिया। श्रुति भूखी रहती, इसलिए उसकी माँ के कान पर रख दी। जब वह घर आई तो मां श्रुति पर बहुत नाराज हुईं। अगर  खाना नहीं चाहती थी, तो तुम मेरे पास क्यों नहीं लायी?'  इत्यादि इत्यादि। 

"मुझे उसमें से कुछ भी पसंद नहीं आया," श्रुति ने गुस्से में कहा। तभी बाबा भी आये। वह भी श्रुति पर नाराज हुए और उन्होंने उसे समझाया भी। श्रुति नाराज मन से सिर नीचे किए कुर्सी पर बैठी थी। टीवी पर खबरें चल रही थीं। श्रुति के पिता समाचार सुन रहे थे। श्रुति ने सहजता से ऊपर देखा। उसने मेलघाट में कुपोषित बच्चों को टेलीविजन पर देखा और तुरंत पूछा," पापा, ये बच्चे इतने सूखे क्यों हैं?"

 "बेटा, उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है, इसलिए उन्हें प्रोटीन, विटामिन, खनिज नहीं मिलते हैं, इसलिए वे बहुत निर्जलित हैं।" बाबा ने कहा।

इतने में माँ बाहर आयी और बोली, “और जिन्हें भोजन मिलता है वे फेंक देते हैं। श्रुति ऐसे खाने को फेंकना नहीं चाहिए। " 

मेरे कार्यालय में, एक खानपान बोर्ड लगता है कि प्लेट में कितना खाना बचा है और कितने लोग इसे खा सकते हैं।"  बाबा ने कहा।

श्रुति ने उत्साह से उछल कर अपनी माँ से कहा,"माँ, मुझे नए साल का संकल्प सूझ गया। मैं फिर कभी प्लेट में खाना नहीं रखुंगी। " (बालभारती से छठी कक्षा के पाठ का अनुवाद)  अनुवाद -मच्छिंद्र ऐनापुरे

सोमवार, 26 दिसंबर 2022

(जापान की बालकहानी) जिज़ो देवता

एक गाँव में मोसाकू नाम का एक गरीब लड़का अपने माता- पिता के साथ एक छोटी सी झोपड़ी में रहता था। वह अपने माता-पिता की बनाई सुंदर टोपियों को बाजार ले जाकर बेचता था। अगले दिन त्योहार था। उन दोनों ने रंग-बिरंगी, आकर्षक टोपियाँ बनाईं और मोसाकू से कहा कि इसे बाज़ार ले जाकर बेच दो; लेकिन दुर्भाग्य से अचानक मौसम बदल गया। तेज हवा चलने लगी। बर्फ़ीला तूफ़ान शुरू हो गया है। कोई घर से बाहर नहीं निकला। अगले दिन के त्योहार की खुशी कहीं नजर नहीं आ रही थी। इतनी भयानक ठंड का सामना करते हुए बेचारा मोसाकू किसी तरह बाजार पहुंच गया। बाजार सुनसान सा नजर आया। वहाँ एक कोने में जगह पाकर मोसाकू जोश से चिल्लाने लगा। 

"टोपी  ले लो टोपी ।  रंगीन, सुंदर आकर्षक टोपियाँ।”
मोसाकु जानता था कि अगर आज टोपियाँ नहीं बिकीं, तो उसे और उसके माता-पिता को भूखे पेट सोना पड़ेगा, और दूसरे दिन पर्व का था। मेहमान, रिश्तेदार सब मिलने आएंगे, तो  उनका आवभगत कैसे करेंगे? टोपियां नहीं बिकेंगी तो पैसे कैसे बनेंगे? पैसा नहीं तो कुछ नहीं होगा... मोसाकू बहुत चिंतित था। 
अंत में हताशा में, वह टोपी का थैला लेकर घर लौटने लगा। उसने दूर से कुछ बच्चों को देखा। वे लाल रंग के कपड़े में लिपटे हुए थे। यह सोचकर कि उसे घर जाने के लिए अच्छी कंपनी मिलेगी, वह तेजी से आगे बढ़ा। लेकिन क्या आश्चर्य! वे बच्चे जिजो देवताओं की मूर्तियाँ थे! कहा जाता है कि जिजो देवता छोटे बच्चों की बुराई से रक्षा करते हैं। उसे लगा कि ये मूर्तियाँ सचमुच ठंड से काँप रही हैं। चूंकि मूर्तियों के सिर पर कुछ नहीं था, इसलिए उनके सिर पर धीरे-धीरे बर्फ जमा होने लगी थी।  मोसाकू मूल रूप से बहुत स्नेही था । यह सोचकर कि उसकी बिना बिकी टोपियाँ काम आएगी, उसने प्रत्येक मूर्ति पर एक एक टोपी रख दी। दस मूर्तियाँ थीं, लेकिन उसके पास केवल नौ टोपियाँ थीं।  अब क्या करें? कोमल हृदय वाले मोसाकू ने तुरंत अपनी टोपी उतारी और मूर्ति पर रख दी। फिर वह संतुष्ट, प्रसन्न होकर घर लौटा। 

माता-पिता मोसाकू का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मोसाकु ने जो कुछ हुआ था उसकी वास्तविकता को दोहराया;  लेकिन अब सवाल था कि रात के खाने का क्या करें? अंत में एक कण भी खाए बिना तीनों सो गए । मोसाकु थक कर सो गया; लेकिन उसकी मां अगले दिन के त्योहार की चिंता में जागती रही। आधी रात को किसी ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया। माँ दरवाजा खोलती है और देखती है, दरवाजे पर दस बच्चे खडे  हैं। हाथ में अलग-अलग डिब्बे थे। मोसाकु की टोपी पहने हुए दसवें लड़के के हाथ में एक बड़ा बक्सा था। इस में कीमती सामान था। मोसाकु के घर में लाई गई हर चीज को रखते हुए उसने कहा, "हम वो बच्चे हैं जिन्हें मोसाकू ने टोपियां दीं।"  

उस दिन से मोसाकु के जीवन में किसी चीज की कमी नहीं रही।  मोसाकु के गुणों से प्रसन्न होकर, जिज़ो देवताओं ने उसका जीवन सुख और संतोष से भर दिया। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, सांगली। महाराष्ट्र। 

रविवार, 25 दिसंबर 2022

पूर्वोत्तर क्षेत्रों में होगा विकास का सूर्य उदय

उत्तर पूर्व भारत के सात राज्य भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिने जाते हैं। ये सात राज्य हैं असम, त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश। उन्हें सप्त भगिनी (सेव्हन सिस्टर) कहा जाता है। यह क्षेत्र बांग्लादेश, म्यांमार, चीन और नेपाल के देशों से घिरा हुआ है। यह भारत से 70 किलोमीटर लंबी लाइन से जुड़ा हुआ है। यहां के लोग मुख्य रूप से गिरिजन यानी विभिन्न स्थानीय जनजातियां हैं जो पहाड़ियों में रहते हैं और अपनी पहचान बनाए रखते हैं। इस क्षेत्र में 160 से अधिक बोलियाँ बोली जाती हैं। नॉर्थ ईस्टर्न कौन्सिल पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में है। 1971 में संसद के एक अधिनियम (1971 के अधिनियम  क्र. 84) द्वारा स्थापित, परिषद का उद्घाटन 7 नवंबर 1972 को शिलांग, मेघालय में किया गया था।

इसके जरिए सरकार ने समेकित विकास प्रयासों का एक नया अध्याय शुरू किया। सिक्किम को 2002 में इस कौन्सिल (परिषद) में आठवें सदस्य के रूप में जोड़ा गया था, जिसमें मूल रूप से अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा नाम के सात राज्य शामिल थे।  प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में दो राज्यों त्रिपुरा और मेघालय का दौरा किया था।  वहां 6,800 करोड़ रुपये की लागत वाली विभिन्न परियोजनाओं का शुभारंभ किया गया। इन परियोजनाओं में आवास, सड़क निर्माण, कृषि, सिंचाई, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, पर्यटन और आतिथ्य व्यवसायों से संबंधित पहल शामिल हैं।

केंद्र सरकार अरुणाचल प्रदेश में फ्रंटियर हाईवे का निर्माण करेगी।  इस हाईवे को अगले पांच साल में पूरा करने के लिए प्रोजेक्ट में तेजी लाई गई है। तिब्बत-चीन-म्यांमार से सटी भारतीय सीमा के बेहद करीब इस हाईवे के बनने से सेना की आवाजाही में आसानी होगी। तवांग में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच हालिया झड़प के मद्देनजर इस परियोजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।  इस प्रोजेक्ट पर 27 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। फ्रंटियर हाईवे को NH-913 नाम दिया गया है और इसकी लंबाई 1748 किमी है। इस हाईवे का निर्माण सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है और सीमा क्षेत्र को विकसित करने के उद्देश्य को ध्यान में रखा गया है। यह हाईवे बोमडिला से शुरू होगा। आगे यह नफरा, हूरी और मोनिगोंग दर्रे से होकर गुजरेगी। ये दोनों पॉर्डट्स भारत-तिब्बत सीमा के काफी करीब हैं। यह चीन सीमा के पास जिदो और चैंकवेंती के पास पैतामधन भी जाएगी। पूरा राजमार्ग नौ पैकेजों में है और भारत-म्यांमार सीमा के पास विजयनगर तक जाएगा। चूंकि इस क्षेत्र में कोई मौजूदा सड़क नहीं है, इसलिए इस सड़क का निर्माण हरित क्षेत्र में किया जाएगा। इसमें पुल और सुरंग भी होंगे।  इस प्रोजेक्ट की पूरी डिजाइन 2024-25 तक तैयार हो जाएगी और इसका निर्माण भी अगले पांच साल में पूरा हो जाएगा। काम 2026-29 तक पूरा होने की उम्मीद है। राजमार्ग विकास को बढ़ावा देगा और स्टेम माइग्रेशन में भी मदद करेगा, खासकर सीमा के पास के इलाकों में।

निर्माण परियोजना के तहत बने मकानों का वितरण त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में किया गया। इस योजना से दो लाख परिवार लाभान्वित होंगे।  केंद्र सरकार ने त्रिपुरा के लिए 4,350 करोड़ रुपये की विभिन्न परियोजनाएं प्रदान की हैं और उन्हें प्रधान मंत्री मोदी द्वारा लॉन्च किया गया था। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत त्रिपुरा में वर्ष 2022-23 में 1 लाख 39 हजार 520 आवास का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है। कोन्सिल (परिषद) ने सलाहकार निकाय और योजना निकाय के रूप में पूर्वोत्तर क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नॉर्थ ईस्ट पुलिस एकेडमी, शिलांग, नॉर्थ ईस्ट रीजन इंस्टीट्यूट ऑफ वॉटर एंड लैंड मैनेजमेंट, तेजपुर, नॉर्थ ईस्टर्न स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, शिलांग, डॉ.  परिषद की मदद से भुवनेश्वर बोरुआ कैंसर संस्थान, गुवाहाटी आदि संस्थानों की स्थापना की गई है। 11,500 किमी से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया।  694 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता स्थापित की गई। लगभग 9,000 किमी की पारेषण और वितरण लाइनों का निर्माण किया गया है। अधोसंरचना में सुधार किया गया। इसके तहत पांच प्रमुख हवाई अड्डों और 11 अंतरराज्यीय बस टर्मिनस परियोजनाओं और चार अंतरराज्यीय ट्रक टर्मिनस परियोजनाओं के सहयोग से अंतरराज्यीय व्यापार और संचार को सुगम बनाने के प्रयास किए गए।

शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, जल संसाधन, कृषि, पर्यटन और उद्योग आदि क्षेत्रों में हुई प्रगति से पूर्वोत्तर क्षेत्र को बहुत लाभ हुआ है। 1972 से, परिषद विभिन्न पूर्वोत्तर राज्यों और राष्ट्रीय राजधानी में सत्तर बार आयोजित की चुकी है। 2016 में शिलांग में आयोजित परिषद के 65वें पूर्ण सत्र के विचार-विमर्श के बाद, राज्यों के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक संसाधनों, ज्ञान और विशेषज्ञता से सुसज्जित एक अत्याधुनिक संसाधन केंद्र स्थापित करने के लिए कदम उठाए गए। परियोजनाओं की योजना बनाने और उन्हें लागू करने, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने और क्षेत्र के लिए एक रणनीतिक दृष्टि प्रदान करने के लिए एक कार्यान्वयन एजेंसी ए  पी  जे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड एनालिसिस की स्थापना अक्टूबर 2016 में आयआयएम शिलांग के तहत की गई थी और नॉर्थ ईस्ट रिसोर्स सेंटर की स्थापना दिसंबर 2021 में नॉर्थ ईस्ट काउंसिल में की गई थी।

हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर पूर्वी परिषद ने पूर्वोत्तर राज्यों के विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों को अपने स्वयं के परिसरों में अपने पुस्तकालयों में हिंदी विभाग स्थापित करने और मजबूत करने में मदद करने की पहल की है। पहले चरण में, हाल ही में स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान पांच राज्यों में समर्थित 21 हिंदी पुस्तकालयों का उद्घाटन किया गया। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला और अखौरा-बांग्लादेश के बीच 980 करोड़ रुपये की लागत से एक रेलवे लाइन परियोजना चल रही है। 15.6 किमी लंबी रेलवे लाइन गंगासागर-बांग्लादेश को भारत में निश्चिंतपुर और वहां से अगरतला तक जोड़ती है। निश्चितपुर में एक ट्रांसशिपमेंट यार्ड भी है।  इस रेल लाइन से उन्हें भी फायदा होगा।

कई पर्यटक सामान्य से अलग तरीके से पर्यटन का आनंद लेने के लिए इस क्षेत्र में आते हैं। बरसात के मौसम में भी यहां दर्शनार्थियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती है। चेरापूंजी, मानसिंगराम जैसे भारी वर्षा वाले क्षेत्र में आनंद लेने के लिए देश भर से पर्यटक इस क्षेत्र में आते हैं। चेरापूंजी में 'सेवन सिस्टर फॉल्स' उत्तर पूर्व भारत में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण बन गया है। यहां के सात राज्यों के संदर्भ में फॉल्स का नाम 'सेवन सिस्टर्स' रखा गया है। यह झरना पहाड़ की चोटियों से सात अलग-अलग जगहों पर गिरता है। इसलिए इस झरने को 'सेवन सिस्टर फॉल्स' भी कहा जाता है। यह झरना 1000 फीट से अधिक गहरा है और मवास माई गांव से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। त्रिपुरा से अनानास विदेशों में पहुंच रहा है।  इतना ही नहीं, बांग्लादेश, जर्मनी से सैकड़ों मीट्रिक टन अनानास और अन्य फल और सब्जियां भी मंगाई जाती हैं।  और दुबई को निर्यात किया जा रहा है। नतीजतन, किसानों की उपज अधिक कीमत प्राप्त कर रही है। पीएम किसान सम्मान निधि से त्रिपुरा के लाखों किसानों को अब तक 500 करोड़ से ज्यादा की राशि मिल चुकी है। अगर वुड उद्योग त्रिपुरा के युवाओं के लिए नए अवसर और आय के स्रोत भी प्रदान कर रहा है।

महाराजा वीर विक्रम एयरपोर्ट न्यू टर्मिनल महाराजा वीर विक्रम एयरपोर्ट नए टर्मिनल भवन का निर्माण आधुनिक सुविधाओं से युक्त है। टर्मिनल में 200 अंतरराष्ट्रीय यात्रियों सहित 1200 यात्रियों को संभालने की क्षमता है। टर्मिनल बढ़ते यात्री यातायात को पूरा करेगा। इसमें सालाना 30 मिलियन यात्रियों को संभालने की क्षमता है। टर्मिनल बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर में टिकट चेकिंग काउंटर, शॉपिंग एरिया, इमिग्रेशन सेंटर, कॉन्कोर्स एरिया और घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आगमन कॉरिडोर हैं। पहली मंजिल पर सुरक्षा क्षेत्र में रेस्तरां, कार्यालय और प्रस्थान लाउंज शामिल हैं। इमारत में 20 चेक-इन काउंटर, कन्वेयर बेल्ट एस्केलेटर, चार यात्री बोर्डिंग ब्रिज, लिफ्ट, इन-लाइन बैगेज सिस्टम, पांच कस्टम काउंटर और दस इमिग्रेशन काउंटर हैं, साथ ही लगभग 500 कारों और दस बसों के लिए पार्किंग और कारों और दोपहिया के लिए अलग पार्किंग है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है की, कई दिनों से सोचा जा रहा था कि सीमावर्ती इलाकों में विकास होगा और संपर्क बढ़ेगा तो दुश्मन को फायदा होगा। लेकिन मैं सोच भी नहीं सकता कि ऐसा कैसे सोचा जा सकता है।  पिछली सरकार की इसी सोच के चलते नॉर्थ ईस्ट समेत देश के सभी सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी नहीं सुधारी जा सकी। लेकिन आज सीमा पर नई सड़कें हैं, नई सुरंगें हैं, नए पुल हैं, रेलवे लाइनें हैं, नए हवाई अड्डे हैं। इन सभी विकास योजनाओं के कार्य तेजी से चल रहे हैं।  हम पहले से उजड़े गांवों को पुनर्जीवित करने में लगे हैं। जिस तरह से हमारे शहर विकसित हो रहे हैं, वैसे ही हमारी सीमाओं पर स्थिति में सुधार की जरूरत है। ऐसे विकास कार्यों से यहां पर्यटन भी बढ़ेगा और गांव छोड़कर गए लोग वापस आएंगे। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, सांगली । महाराष्ट्र।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

प्रकृति हैं मनुष्य की सच्ची मित्र

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पहले के समय से यह गिरोहों या समूहों द्वारा बसा हुआ है। समूह मन, समूह भावना उसका स्थायी भाव है।  लेकिन बाकी दुनिया ने अनुभव किया है कि क्या हो सकता है जब यही समूह भावना लालच में परिलक्षित होती है। जैसे-जैसे मनुष्य विकसित हुए, उन्होंने अधिक उन्नत, आधुनिक जीवन शैली अपनाना शुरू किया। विकास के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट किया जाने लगा। मनुष्य का प्रकृति से वियोग, प्रकृति को कुरेदना अपनी ही जड़ पर संकट है,यह बताने के लिए किसी ज्योतिष की जरूरत नहीं है! 

कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे-जैसे मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है, उसका विनाश निकट आ रहा है। दो साल से कोहराम मचा रही वैश्विक कोरोना महामारी ने यह साबित कर दिया है। (अब उसने फिर से हाथ-पांव फैलाना शुरू कर दिया है।) फिर भी मनुष्य सुधार ने को तैयार नहीं है। कोरोना महामारी ने क्या सिखाया? तो भौतिक सुख, भौतिकवाद किसी काम का नहीं है । जिसे हम विकास कहते हैं, जिसे हम धन कहते हैं, वह निष्प्रभावी है। हाथ में चाहे कितनी भी दौलत क्यों न हो, वह मौके पर किसी काम की नहीं होती। भौतिक सुख क्षणभंगुर है। तो शाश्वत सत्य क्या है?  प्रकृति और प्रकृति के नियम शाश्वत सत्य हैं। मनुष्य को जीवित रहने के लिए स्वच्छ हवा, पानी, भोजन और आश्रय की आवश्यकता होती है। इन आवश्यकताओं के अतिरिक्त अभी भी मनुष्य द्वारा स्वयं के लिए निर्मित आवश्यकताएँ हैं। उच्च वर्ग का रहन-सहन, तकनीक का अत्यधिक उपयोग और अधिक सुख-सुविधाओं की आवश्यकता...  है.यह साफ महसूस हो रहा है. की लेकिन इन तमाम अतिरिक्त जरूरतों और उससे पैदा हुई चाहत को पूरा करने का बोझ अब हमारी जड़ों पर उठने लगा है। इससे डूबने वाले व्यक्ति की जैसी हालत मनुष्य की हो गई है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए मनुष्य को विकास और प्रगति की अपनी इच्छा को त्याग कर एक बार फिर से प्रकृति के करीब जाना होगा। प्रकृति के साथ सहयोग हमेशा मनुष्य की भलाई के लिए रहा है। जिस समय मनुष्य प्रकृति से दूर चला गया... विकास की इच्छा के कारण पर्यावरण नष्ट हो गया, उस समय मनुष्य को कष्ट उठाना पड़ा है। इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं। यह बार-बार सिद्ध हो चुका है कि प्रकृति से बचकर या प्रकृति का उपहास उड़ाकर, उसे नुकसान पाहूंचा कर मानव प्रगति नहीं की जा सकती। इसलिए नव वर्ष में नया संकल्प एक ही होना चाहिए - लोभ से होगा ऱ्हास, रख लो प्रकृति संरक्षण का झण्डा अपने पास।

प्रकृति ने हमेशा देने की भूमिका स्वीकार ली है।  वह सर्वोत्तम दाता है। हवा, पानी, भोजन, धूप सब कुछ प्रकृति ने मुफ्त में प्रदान किया है।  आपने कोरोना के दौरान ऑक्सीजन का महत्व सीखा है। प्रकृति हमें यह ऑक्सीजन मुफ्त में देती है। यह और भी कई जरूरतों को पूरा करती है, यहां तक ​​कि प्रकृति भी मनुष्य की जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी जरूरतों को पूरा करती है। बचपन के पालने से लेकर जवानी का घर, जलाऊ लकड़ी, फर्नीचर से लेकर बुढ़ापे की छड़ी तक, प्रकृति सब कुछ देती है। प्रकृति अनेक प्रकार की औषधि, स्वस्थ शहद, गोंद, पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण, संवर्धन प्रदान करती है। प्रकृति जल चक्र, जीवन चक्र, खाद्य श्रृंखला को संतुलित करती है। प्रकृति सभी प्रेरणा का स्रोत है। विकास का प्रारंभिक बिंदु है।  यह सर्जन का आविष्कार है। वे समस्त कलाओं के रचयिता हैं।ऊर्जा का सबसे अच्छा स्रोत प्रकृति है। ऐसी व्यापक, जीवनदायी प्रकृति की रक्षा की जानी चाहिए। मनुष्य को प्रकृति का उपभोग किए बिना उसका रक्षक बनना चाहिए।  इसी में मानव कल्याण निहित है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रकृति मनुष्य की सच्ची मित्र, रक्षक है। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, सांगली। महाराष्ट्र।

जरूरतें और मोल

एक बार गौतम बुद्ध के आश्रम में उनके अनुयायियों के बीच चर्चा हुई कि 'अनमोल' क्या है? इस दुनिया में सबसे अनमोल चीज क्या है? इसमें किसी ने जीवन की आवश्यक वस्तुओं जैसे भोजन, पानी, हवा, आश्रय, वस्त्र का उल्लेख किया है। कुछ ने सोना, सिक्के, हीरे जैसी ऊंची चीजें बताईं। यह तर्क अंत तक समाप्त नहीं हुआ। तब सबने सोचा कि गुरुवर्य से पूछ लिया जाए। वे गौतम बुद्ध के पास गये। गौतम बुद्ध ने अपने जीवन में अपार धन और वैभव का अनुभव किया था, और फिर भी, शांति की तलाश में, उन्होंने शाही सिंहासन को त्याग दिया और ध्यान करने के लिए जंगल में चले गए। वे निश्चित रूप से जानते थे कि धन में शांति नहीं है, और इसलिए यह अनमोल नहीं हो सकता। गौतम बुद्ध एक क्षण के लिए शांत बैठे और उत्तर दिया, "जरूरत के समय उपलब्ध होने पर हर चीज अनमोल  हो सकती है। ‘what is given at the time of need is priceless’. अगर आपके पास महल भी है और जंगल में चलते हुए आपको प्यास लगती है, तो उस समय पानी सबसे अनमोल वस्तु होने वाला है। भूखे के लिए रोटी की कीमत सबसे कीमती होगी। जो लोग स्थायी रूप से किराए के मकान में रहते हैं, उनमें अपना घर लेने की प्रबल इच्छा होगी। युवाओं को शादी की आवश्यकता होगी, वृद्धावस्था में आप अपने नाती-पोतों के साथ शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहेंगे। मानव की जरूरतें स्थान, समय और उम्र के सापेक्ष होती हैं। वे समय के साथ बदलते हैं। जरूरत के समय वह चीज जरूरतमंद के लिए अनमोल होगी। 

एक बार गौतम बुद्ध और उनके शिष्य एक गांव से दूसरे गांव पैदल जा रहे थे। रास्ते में आराम करने के लिए, वे सभी एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे ठहर गये। गौतम बुद्ध ने अपना ध्यान समाप्त किया और उस पेड़ के नीचे विश्राम किया। उठकर जाते समय उन्होंने वृक्ष को प्रणाम किया। गौतम बुद्ध को पेड़ के सामने झुकते देख शिष्य हैरान रह गए और बुद्ध से पूछा, ''आप ने एक पेड़ को प्रणाम क्यों किया?  क्या कुछ अनहोनी हो गई है?'' इस पर गौतम बुद्ध हंसे और बोले, " पेड़ नहीं बोलते तो क्या हुआ?" जैसे हर इंसान की शरीर की भाषा होती है, वैसे ही प्रकृति और पेड़ों की होती है। मैंने इस वृक्ष को प्रणाम करके सम्मान व्यक्त किया। मैं इस वृक्ष के नीचे बैठ गया, अपनी साधना पूरी की, विश्राम किया। मुझे इस पेड़ की ठंडी छांव ने प्रेम दिया, ममता दी। मुझे यहां शांति मिली। इसलिए मेरा कर्तव्य है कि मैं इस वृक्ष के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करूं। प्रकृति हमें हवा, पानी और आश्रय देती है। इसके प्रति आभार व्यक्त करना हमारा धर्म है। आप सभी इस पेड़ को अच्छी तरह से देखें, पेड़ ने अब मेरी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति का जवाब दिया है। इसकी प्रतिक्रिया पेड़ के पत्तों की सरसराहट है। पेड़ अपने पत्तों की सरसराहट से हमसे संवाद कर रहा है और यह आश्वासन भी दे रहा है कि मैं इसी तरह मानव जाति की सेवा करता रहूंगा। तुरंत सभी शिष्यों ने भी हृदय से वृक्ष को प्रणाम किया और वहां से निकल  गए। 

दोस्तों मैं भी अपने घर के पौधों को पानी देते समय 'मैं आप से पूरे दिल से चाहता हूं,'' कहता हूं। इससे पेड़ों की वृद्धि अच्छी तरह से होती है। इसके विपरीत, यदि आप पेड़ों के बारे में बुरा बोलते हैं, यदि आप उन्हें चोट पहुँचाते हैं, तो वे मर जाते हैं। इसलिए सभी के साथ प्यार से पेश आने की कोशिश करें।  अगर नहीं तो आप निश्चित रूप से चुप रह सकते हैं। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, सांगली। महाराष्ट्र।