गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

( बाल कहानी) राजा ब्रूस और मकड़ी

बहुत पहले, स्कॉटलैंड पर राजा ब्रूस का शासन था। वह बहुत अच्छा राजा था; लेकिन उसके भी कुछ दुश्मन  थे। ऐसे ही एक शक्तिशाली शत्रु ने एक बार स्कॉटलैंड पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया। दुश्मन की सेना बहुत बड़ी थी और ब्रूस राजा की छोटी। उनके बीच युद्ध हुआ। कहने की आवश्यकता नहीं कि परिणाम क्या हुआ? राजा ब्रूस के कई पराक्रमी सैनिक मारे गए और कई घायल हुए। राजा ब्रूस को युद्ध के मैदान से भागना पड़ा। शत्रु उसका पीछा करने लगा। राजा ब्रूस शत्रु के डर से भाग रहा था। राजा ब्रूस एक जगह से दूसरी जगह दौड़कर दौड़कर थक गया था। इतना ही नहीं इस हार से उसे गहरा दुख भी हुआ था। अंत में वह एक जंगल में पहुंचा। राजा ब्रूस ने उस जंगल में एक गुफा देखी। राजा ब्रूस गुफा में गया और थक कर बैठ गया। "दुश्मन के चंगुल से बच निकला," उसने खुद से कहा। कुछ देर बाद राजा ब्रूस का ध्यान अचानक गुफा की एक दीवार पर गया। वहां एक मकड़ी जाला बुन रही थी। जाला बुनती मकड़ी दीवार पर चढ़ गई, बीच में ही गिर पडी। मकड़ी फिर से दीवार पर चढ़ गई, लेकिन वापस नीचे गिर गई। ऐसा छह बार हुआ;  लेकिन उस मकड़ी ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा। उसने बार-बार दीवार पर चढ़ने की लगातार कोशिश की और आखिरकार गुफा की छत पर पहुंच गयी। “इतनासा कीड़ा;  लेकिन यह कितना बहादुर है!' राजा ने मन ही मन कहा, "छोटी मकड़ी, तुम मेरी शिक्षक हो। 'तेरी तरह मैं भी बार-बार प्रयास करूंगा। मैं अपने शत्रु को हराऊंगा और उसे अपने देश से निकाल दूंगा।" 

उसके बाद राजा ब्रूस गुफा से निकलकर अपनी प्रजा में वापस चला गया। राजा ब्रूस के सभी सैनिक उसके चारों ओर एकत्रित हो गए। उसके बाद फिर एक बड़ा युद्ध हुआ। हालांकि, इस बार राजा ब्रूस की सेना ने दुश्मन को हरा दिया और दुश्मन को स्कॉटलैंड से बाहर खदेड़ दिया। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, जत जि. सांगली 

सुंदर अक्षर एक सुंदर आभूषण

सर क्लास में आए। उन्होंने निबंध लेखन प्रतियोगिता के परिणाम की घोषणा की और कहा, "मुझे अनीता और सुरेश का निबंध बहुत पसंद आया। मुझे समझ नहीं  आ रहा था कि किसका निबंध चुनूं। दोनों निबंधों की सामग्री विचारोत्तेजक और आत्मनिरीक्षण करने वाली है; लेकिन फिर भी मुझे सुरेश का निबंध चुनना पडा, क्यों की सुरेश का पढ़ने योग्य, घुमावदार अक्षर और शुद्ध, दोषरहित लेखन।'

हर अक्षर का अलग मोड़ होता है। कुछ लोगों के अक्षर टपोरे, वाटोले और बक्दार होते हैं। अक्षरों में एकरूपता होती है। दो अक्षरों के बीच, दो शब्दों के बीच की दूरी समान होती है। अक्षरों का आकार सही होता है। लिखावट साफ सुथरी होती है। ऐसे लेखन, अक्षरों ने एक सौंदर्य प्राप्त कर लिया होता है, तो कुछ की लिखावट बहुत ही खराब होती है। यह पढ़ने योग्य नहीं होता।  हाथी के पैर को चींटी पर लगाने पर जैसे दिखाई देता है, वैसे अक्षर दिखते हैं। क्या कोई ऐसा अक्षर पढ़ना चाहेगा? उन अशुद्ध अक्षर, शब्द और लेखों को पढ़ना आँखों को थका देने वाला और तनाव देने वाला होता है। 

सुन्दर अक्षर को 'गहना' माना जाता है। कहा जाता है कि अक्षर से व्यक्ति के अधिकांश स्वभाव को समझा जा सकता है।  स्वच्छ, सुंदर और घुमावदार अक्षर, लिपि का बहुत महत्व है। स्कूल-कॉलेज से लेकर कार्यस्थल तक खूबसूरत हैंडराइटिंग बहुत काम आती है। आपकी लिखावट सुंदर होने के बावजूद स्कूल-कॉलेज की परीक्षा के पेपर परीक्षक आपकी लिखावट के बल पर अच्छे अंक देते हैं। भले ही पेपर में उत्तर कम हो या 100% सही न हो, आप अपनी सुंदर लिखावट से खुद को पेपर परीक्षा में स्कोर करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। ऐसी शक्ति सुंदर अक्षरों में निहित है। हालाँकि आजकल लिखने के लिए कंप्यूटर का उपयोग किया जाता है, लेकिन अच्छे लेखन का महत्व कभी कम नहीं होगा। कंप्यूटर पर विभिन्न प्रकार के फोंट का उपयोग किया जाता है। 

लिखावट सुधारने के लिए तरह-तरह के प्रयास किए जाते हैं, कक्षाएं होती हैं। लेकिन फिर भी सबकी लिखने की शैली अलग होती है। जैसे कोई भी दो चेहरे एक जैसे नहीं होते, वैसे ही कोई भी दो हस्तलेख बिल्कुल एक जैसे नहीं होते। आपके कलम पकड़ने के तरीके से सब कुछ अलग है। हमारा व्यक्तित्व हमारी लिखावट से झलकता है और उसके लिए ग्राफोलॉजी, जैसे विशेष पाठ्यक्रम हैं। लिखावट विशेषज्ञ होते हैं। सुलेख लिखावट की कला मतलब 'कॅलिग्राफी' । इसी तरह कैलीग्राफी की कला के जरिए भी करियर के कई रास्ते उपलब्ध हैं। कैलीग्राफी जैसी कला में हमें अक्षरों का बेहतरीन अविष्कार देखने को मिलता है और अक्षर अधिक वाक्पटु हो जाते हैं। 

हाथ से लिखने से रचनात्मकता बढ़ती है, समझ बढ़ाता है, लिखते समय हमारा दिमाग पूरी तरह व्यस्त रहता है। समस्या समाधान कौशल प्राप्त करता है, लेखन अभ्यास परीक्षा में उपयोगी है। परीक्षा में आपको केवल तीन घंटे में 100 अंकों का पेपर हल करना होता है। इसलिए अगर हम लिखने में अच्छे हैं, तो हम तीन घंटे में 100 अंकों का पेपर आसानी से कवर कर सकते हैं। 

हमारा पढ़ने योग्य, घुमावदार अक्षर और शुद्ध, दोषरहित लेखन होना चाहीए। इतने सुंदर अक्षर का उपहार पाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। सुंदर अक्षर बनाने में बहुत मेहनत लगती है। बिना थके या ऊबे, दैनिक अभ्यास से अक्षरों को उचित शक्ति प्राप्त होती है। अक्षर घुमावदार  हो जाते हैं और फिर धीरे-धीरे मोती जैसे सुंदर अक्षर कागज पर दिखने लगते हैं। अक्षर को खराब न करने के लिए, कभी भी अक्षरों पर आंख मूंदकर न चलें। सुंदर अक्षर एक सुंदर आभूषण होता है।  “मैं इस रत्न को हमेशा अपने पास रखूँगा।' सभी को यह संकल्प लेना चाहिए। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, जत जि. सांगली 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

महंगाई का दुष्चक्र

महंगाई एक ऐसी समस्या है जिसका सामना न केवल भारत बल्कि अन्य उन्नत देश भी कर रहे हैं। लेकिन प्रत्येक देश में मुद्रास्फीति उस देश में विभिन्न कारकों से प्रभावित होती है। भारत में मुद्रास्फीति की समस्या के कारणों के बारे में... भारत में महंगाई दर 2022 में 5.7%, जनवरी 2023 में 6.5% और फरवरी में 6.4% थी। देश में महंगाई बढ़ने के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं।  यह इस प्रकार है- तेल की कीमतों में बढ़ोतरी- भारत हर साल औसतन 1कोटी 30 लाख टन तेल का आयात करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध का प्रभाव भारत पर विशेष रूप से स्पष्ट होता दिख रहा है। क्योंकि भारत 85% तेल आयात करता है।  सूरजमुखी के तेल का 80% यूक्रेन से और 5% रूस से आयात किया जाता है। हम अन्य तेलों के लिए मलेशिया समेत मध्य एशियाई देशों पर निर्भर हैं। नतीजतन, रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय तक चले युद्ध का कच्चे तेल की कीमतों के साथ-साथ खाद्य तेल की कीमतों पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ा है। सूरजमुखी के तेल के विकल्प के रूप में पाम तेल की मांग बढ़ी है। इंडोनेशिया पाम के तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है। लेकिन तेल की कमी को देखते हुए उन्होंने भी दाम  बढ़ा दिए। भारत ने जनवरी में 11 लाख टन पाम ऑयल का आयात किया। खनिज और खाद्य तेल के आयात पर भारत की निर्भरता महंगाई को नियंत्रित करने में एक बड़ी बाधा है। इससे तेल आधारित सामानों की कीमत बढ़ जाती है। 

निविष्ठा (इनपुट) लागत में वृद्धि - दालों और अनाजों की बढ़ती कीमतों से चारे की कीमतों में वृद्धि होती है। जिससे इनपुट कॉस्ट बढ़ जाती है। गरीब लोगों को दालों और अनाजों से अधिक प्रोटीन और विटामिन मिलते हैं। इसलिए दैनिक जीवन में इसका प्रयोग अधिक होता है। दिसंबर 2022 में खाद्यान्न की महंगाई दर 13.8 फीसदी थी, जो 2023 में 16.1 फीसदी पर पहुंच गई. 

खाद्यान्न मुद्रास्फीति में वृद्धि - खाद्यान्न मुद्रास्फीति लगातार बढ़ रही है।  उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (सीपीआई) दिसंबर 2022 के 4.2 प्रतिशत से बढ़कर जनवरी 2023 में 5.9 प्रतिशत हो गया। देश में बहुत अधिक गेहूं और चावल की खपत होती है। 2022 में तापमान बढ़ने से गेहूं के उत्पादन में गिरावट आई। इसी समय, रूस-यूक्रेन युद्ध ने विश्व बाजार में गेहूं की कमी पैदा कर दी। सरकार का फैसला गेहूं के दाम कम करने के लिए तीन लाख टन गेहूं खुले बाजार में बेचने का था। खुले बाजार में बिकने के बावजूद बाजार भाव ठंडे नहीं पड़े हैं। ई-नीलामी के माध्यम से थोक उपभोक्ताओं को गेहूं 2350 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचने का निर्णय लिया गया, जबकि दूसरी ओर भारत गेहूं की तुलना में अधिक चावल का उत्पादन और खपत करता है। चावल और गेहूं जैसे प्रमुख अनाजों की कीमतें बढ़ीं।  नतीजतन, अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं। 

ईंधन की कीमतों में वृद्धि - पेट्रोल की आज की कीमत 106 रुपये है, जबकि डीजल 93 रुपये प्रति लीटर है।  रसोई गैस की कीमत हाल ही में बढ़कर 1105 रुपये हो गई है। एक ओर बढ़ती जनसंख्या और उसकी बुनियादी ज़रूरतें जैसे भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य। चूंकि प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, चुनौती दोनों को संतुलित करने की है। आपूर्ति-मांग असंतुलन भी मुद्रास्फीति का एक प्रमुख कारण है। जैसे-जैसे कीमतें बढ़ती हैं, उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति घटती जाती है। मुद्रास्फीति न केवल खरीदारों को बल्कि उत्पादक को भी प्रभावित करती है, जिन्हें कच्चे माल की उच्च लागत का भुगतान करना पड़ता है। यह एक दुष्चक्र है, जिसमें एक कारक में परिवर्तन अन्य संबंधित कारकों को प्रभावित करता है। 

जलवायु परिवर्तन - खाद्य मुद्रास्फीति के लिए एक और खतरा जलवायु परिवर्तन है। कटाई के मौसम के दौरान गर्मी की लहरों ने गेहूं के उत्पादन को प्रभावित किया और अब मानसून की बारिश के अनियमित वितरण के कारण चावल को नुकसान हो रहा है। बेमौसम बाढ़, बारिश, सूखा और ग्लोबल वार्मिंग में लगातार वृद्धि भी महत्वपूर्ण कारण हैं। मुद्रास्फीति की दर को रोकने के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक को नीतिगत बदलाव करने की जरूरत है। इसके लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीति अपनाकर महंगाई को रोका जा सकता है। अर्थशास्त्री कीन्स ने जोर देकर कहा कि अर्थव्यवस्था को बूस्टर के रूप में मुद्रास्फीति की एक मामूली खुराक दी जानी चाहिए। कीन्स के अनुसार, रोजगार सृजन और रोजगार वृद्धि के लिए एक सचेत प्रयास की आवश्यकता है और इसके लिए सरकार को घाटे का बजट पेश करना चाहिए और निजी और सरकारी निवेश करना चाहिए। इससे ही आर्थिक संकट से बचा जा सकता है। 

चौड़ी खाई- 2023 तक भारत की दैनिक और मासिक बेरोजगारी दर लगभग 7. 45% है। शहरी भारत में 7.  93% जबकि ग्रामीण भारत में केवल 7.  44% है। बेरोजगार आबादी वैकल्पिक रोजगार चाहती है;  लेकिन श्रम का उचित मूल्य न मिलने के कारण वे बेरोजगारी के गर्त में गिर जाते हैं। नतीजतन, एक तरफ कम आय और दूसरी तरफ बढ़ती महंगाई के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, जत जि. सांगली  

सोमवार, 3 अप्रैल 2023

अच्छा खाना ही दवा है

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज विश्व के पांच प्रतिशत वयस्क अवसाद से पीड़ित हैं। हम लगातार तरह-तरह के तनाव से गुजरते हैं, कई लोग सकारात्मक सोच अपनाकर इससे बाहर आ जाते हैं;  लेकिन जो इसे हासिल नहीं कर पाते उनके लिए तनाव डिप्रेशन में बदल जाता है। कई लोग नशे की लत में पड़ जाते हैं तो कुछ एलोपैथिक दवाएं लेते हैं। लेकिन कई बार इसके दुष्प्रभाव इसे अस्थाई समाधान बना देते हैं। ऐसे में क्या इंसान की आहार (डाइट) उसके लिए दवा हो सकती है? स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना में प्रो.  जोस फर्नांडीज रियल और उनके सहयोगियों के शोध ने इसका जवाब 'हां' में दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि हमारे आहार में अमीनो एसिड 'प्रोलाइन' की बढ़ी हुई मात्रा भी अवसाद पैदा करने के लिए जिम्मेदार होती है। उनका शोध वैज्ञानिक पत्रिका 'सेल मेटाबोलिज्म' में प्रकाशित हुआ है। यह साबित करने के लिए कि अवसाद के लिए एक प्रोलाइन-समृद्ध आहार जिम्मेदार है, उन्होंने कुछ व्यक्तियों को प्रोलाइन-समृद्ध अंडे, डेयरी उत्पाद, मछली और अन्य मांसाहारी खाद्य पदार्थों का प्रोटीन युक्त आहार दिया। सभी व्यक्तियों को एक विशिष्ट स्वास्थ्य प्रश्नावली दी गई थी। जब उनके रक्त का परीक्षण किया गया, तो कुछ व्यक्तियों में प्रोलाइन का स्तर ऊंचा था और सवालों के जवाब में अवसाद स्पष्ट था। हालांकि, कुछ में यह रक्त में ऊंचा नहीं था, इसलिए अवसाद का पता नहीं चला। जब वैज्ञानिकों ने इसके पीछे के कारणों की तलाश की तो उन्हें इन व्यक्तियों की आंत में विशिष्ट बैक्टीरिया मिले, जो आहार में अतिरिक्त प्रोलाइन को नियंत्रित करते थे। डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों में इन बैक्टीरिया की कमी पाई गई। 

वे कहते हैं कि अवसाद को नियंत्रित करने के लिए मांसाहारी खाद्य पदार्थ, दूध, अंडे, मछली के आहार को नियंत्रित करते हुए गोभी, दालों का अधिक सेवन करना वांछनीय है।  आखिर वे कहते हैं, 'खाना ही दवा है।'

निरंतर प्रयास से ही मिलती है सफलता

यदि आप किसी चीज में महारत हासिल करना चाहते हैं, तो आपको उसके प्रति जुनूनी होना होगा। नियमित अभ्यास से उसमें पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। एक समर्पित कार्य रवैया होना चाहिए। विचार में अच्छाई हो और कर्म में निरंतरता हो तो सफलता भी उसके आगे सिर झुकाती है। यदि किसी कार्य में दिनचर्या हो तो आप अपने प्रतिस्पर्धियों को भी आसानी से मात दे सकते हैं। असफलता के कारण रुकें नहीं। एक बार, दो बार असफलता मिलेगी, तीसरी बार सफलता निश्चित है।  हिम्मत मत हारो। 

क्रिकेट में हर टेस्ट मैच में एक बल्लेबाज शतक नहीं लगा सकता है। कई बार यह लगातार जीरो पर भी आउट हो जाता है। लेकिन मेहनत और प्रयास से उसमें निरंतरता आती है।  वह हमेशा अच्छा स्कोर करने की कोशिश करता है। जैसा खेल के साथ है, वैसा ही जीवन के साथ भी होता है। ऐसा नहीं है कि बिजनेस से हर दिन बड़ी आमदनी होगी। किसानों की उपज का हमेशा अच्छा दाम नहीं मिलता है। लेकिन यह सही नहीं है कि किसान खेती छोड़ दे या व्यापारी अपना धंधा छोड़ दे। 

गलतियाँ कैसे होती हैं, क्यों होती हैं, इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्हें सुधार करने में सक्षम होना चाहिए। अगर आपको कोई बात समझ में नहीं आती है, तो आपको इसे खुलकर कहना चाहिए। दुख व्यक्त करने से मन हल्का होता है। थोड़ा समर्थन मिलता है। काम की एक नियमित दिनचर्या थके हुए मन को शक्ति दे सकती है।  निरंतर आसक्ति से ही मनुष्य नारायण बनता है। निरंतर अभ्यास आत्मज्ञान का द्वार खोलता है। बस विश्वास के साथ अभ्यास करते रहना चाहीए। अभ्यास में की गई गलतियों को सुधार कर प्रयास करते रहने से सफलता निश्चित है।  साथ ही यदि किसी कार्य में नियमितता हो तो आप अपने प्रतिस्पर्धियों को भी आसानी से मात दे सकते हैं। आपकी नियमितता के कारण आपका विरोधी भी पीड़ित हो सकता है और शत्रुता छोड़ सकता है। 

रविवार, 2 अप्रैल 2023

नमक का सेवन सावधानी से करना बेहतर

नमक और हमारी जीवनशैली का अटूट संबंध है। सामाजिक मामलों में नमक के बारे में कहावतें और मुहावरें भी लोकप्रिय हैं। 'नमक का हक़ अदा करना' ऐसा हम कहते हैं। 'वतन का खाया नमक तो नमक हलाल बनो ....'  हम सभी ने अमिताभ बच्चन का यह गाना सुना है। नमक पर कर कम करने की मांग को लेकर महात्मा गांधी ने ब्रिटिश राजस्व में प्रसिद्ध दांडी यात्रा निकाली। यह नमक हमारे जीवन में महत्वपूर्ण है। लेकिन आधुनिक समय में यह कहने का समय आ गया है कि अधिक नमक का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह सच है कि नमक के बिना मनुष्य का जीवन नीरस और बेस्वाद है, सब कुछ बेकार है। लेकिन जब यह अनुपात से बाहर हो जाता है तो यह खतरनाक हो जाता है। 

नमक की इस कहानी को प्रस्तुत करने का कारण है, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने दुनिया के तमाम लोगों से कहा है कि 'कम से कम नमक खाओ', खाने में जितना हो सके इसे कम कर दें।' 2013 में, दैनिक आहार में नमक को तीस प्रतिशत कम करने का निर्णय लिया गया। 2025 तक इस लक्ष्य को हासिल करने का निर्णय लिया गया था। हालाँकि, दुनिया भर के कुछ मुट्ठी भर देशों ने उस दिशा में कदम उठाए हैं। इसमें ब्राजील, चिली, चेक रिपब्लिक, उरुग्वे, सऊदी अरब, स्पेन, मैक्सिको जैसे चुनिंदा देश शामिल हैं। हालाँकि, भारत सहित अधिकांश देशों ने इस संबंध में पर्याप्त और ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इन देशों के सरकारी संगठनों ने नमक के उपयोग के बारे में जन जागरूकता पैदा करने और खाद्य निर्माताओं को दिशानिर्देश जारी करने के बारे में अपना मुंह बंद कर लिया है। खेद का विषय है कि कोई ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाया गया। दशकों में तेजी से औद्योगिकीकरण, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का विस्तार, वैश्वीकरण, जीविका के लिए घर से दूसरे स्थानों पर प्रवास और अन्य संक्रमणों ने हमारी जीवन शैली और खाने की आदतों में भारी बदलाव किया है।  गतिहीन जीवन शैली में वृद्धि नई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रही है। 

भोजन में नमक की अधिकता के कारण हमें हृदय रोग, रक्त वाहिका विकार, रोग, पक्षाघात, गुर्दे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे प्रदूषण के अलावा और भी कारण हैं। लेकिन इसका मुख्य कारण घर में स्वादिष्ट, ताजा भोजन के ऊपर पैकेज्ड, प्रोसेस्ड फूड की लालसा और उसकी क्रेज है। फास्ट फूड का क्रेज लगातार बढ़ता जा रहा है। मॉल के आकर्षक परिवेश में सीलबंद देशी-विदेशी उत्पाद ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। हालांकि, इसमें नमक का ज्यादा इस्तेमाल खाने के स्वाद को बढ़ाने के साथ-साथ गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को न्यौता दे रहा है। नमक की अधिक खपत से अमीर और गरीब दोनों देशों पर ग्रहण लग गया है। उच्च आय वाले देशों में, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ आहार नमक का सेवन 75 प्रतिशत तक बढ़ रहे हैं। कम आय वाले देशों में सॉस, सूप सहित घरेलू व्यंजनों में नमक की बढ़ती खपत चिंताजनक है। अचार, पापड़, नमकीन, फरसान समेत सीलबंद और प्रोसेस्ड फूड की खपत भी तेजी से बढ़ी है। उसमें से हम प्रतिदिन आवश्यकता से कई गुना अधिक नमक डाल देते हैं। 

दुनिया में एक व्यक्ति प्रतिदिन आठ से उन्नीस ग्राम नमक विभिन्न माध्यमों से ग्रहण करता है। स्वास्थ्य संगठन कहता है कि एक वयस्क को विभिन्न माध्यमों से प्रति दिन पाँच ग्राम नमक (दो ग्राम सोडियम) का सेवन करना चाहिए;  बच्चों को तीन ग्राम नमक का सेवन करना चाहिए। विशेषज्ञ में इस प्रमाण पर मतभिन्नता हैं, हालांकि, अधिक खपत के खतरों के बारे में कोई असहमति नहीं है। स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अगर स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों का पालन किया जाए तो हृदय रोग, संवहनी रोग और स्ट्रोक के कारण प्रति वर्ष 25 लाख मौतों से बचा जा सकता है।  यह संख्या विवादित हो सकती है।  लेकिन यह सच है कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव काफी कम होगा। 'शोले' का डायलॉग 'सरदार मैंने आपका नमक खाया है' अब एक अलग संदर्भ में याद किया जाता है। मानो आज का 'गब्बर सिंह' कह रहा हो 'ज्यादा नमक खाया, तो अब (दवा की) गोली खां'। जरूरत इस बात की है कि उस चेतावनी को गंभीरता से लिया जाए और गोलियां लेने का समय न आने दिया जाए। आहार में नमक कम करने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाने चाहिए। जन-जागरूकता से कैसे नमक की खपत को कम किया जा सकता है, इस पर जोर दिया जाना चाहिए। हालांकि इस तनावपूर्ण समय के दौरान प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से बचना असंभव है, लेकिन उनमें नमक की मात्रा को कम करना संभव है। इसके लिए सीलबंद खाद्य निर्माताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे अपने उत्पादों में नमक की मात्रा कम करें। पैकेजिंग पर 'कम नमक वाले पदार्थ' का प्रमुखता से उल्लेख करने के लिए बाध्य होना चाहिए। मानकों को भोजन के प्रकार में नमक और सोडियम सामग्री की अधिकतम मात्रा भी निर्धारित करनी चाहिए। उसे समझाने के लिए जन जागरूकता पैदा की जानी चाहिए कि नमक के अधिक सेवन से जीना कितना खतरनाक है। नमक के अधिक सेवन से बीमारियां बढ़ जाती हैं, वहीं शरीर में इसकी कमी कई बार जटिल बीमारियों या समस्याओं को जन्म दे देती है।इसलिए नमक का सेवन सावधानी से करना ही बेहतर है! -मच्छिंद्र ऐनापुरे, जत जि. सांगली 

बेरोजगारी की समस्या का समाधान क्या है?

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) ने मार्च में बेरोजगारी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की;  जनवरी और फरवरी में यह क्रमश: 7.14 और 7.45 फीसदी थी। पिछले दिसंबर में यही दर 8.30 फीसदी थी। मार्च में शहरी बेरोजगारी 8.4 फीसदी और ग्रामीण 7.5 फीसदी रही है। बेरोजगारी हरियाणा (26.8 प्रतिशत) में सबसे अधिक है, इसके बाद राजस्थान, सिक्किम, बिहार, झारखंड आदि का क्रम आता हैं। हाल के वर्षों में एक प्रमुख चिंता शहरी बेरोजगारी की बढ़ती समस्या है। बेरोजगारी की समस्या कोरोना महामारी के पूर्व से ही झेलनी पड़ रही है। कोरोना काल में हुए लॉकडाउन, औद्योगिक उत्पादन ठप होने और निश्चित रूप से सभी सहायक उद्योगों पर इसका असर होने से बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई थी। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में, जब कोरोना वायरस कम हुआ, हमने इस महामारी पर बेहतर तरीके से काबू पाया और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया। परिणामस्वरूप हम बेरोजगारी की समस्या की गंभीरता को कम करने में सक्षम हुए हैं। संतोष की बात है कि मनरेगा के तहत रोजगार मिलने के कारण ग्रामीण बेरोजगारी अपेक्षाकृत कम हुई। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, साथ ही कृषि क्षेत्र में शहरों से गांवों की ओर लौटे हाथों को रोजगार मिला। हालांकि, नीति निर्माता शहरी बेरोजगारी को कम करने में सफल नहीं हुए हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 'भारत जोड़ो यात्रा' निकाली, और समय-समय पर विपक्षी दलों द्वारा  प्रदर्शन किया गया।  इस आंदोलन के जरिए महंगाई और बेरोजगारी दो प्रमुख मुद्दों पर  जोर दिया जा रहा है। पिछले अक्टूबर में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 'रोजगार मेला' के माध्यम से देश भर में दस लाख नौकरियां देने की घोषणा की। हालाँकि, सरकारी रोजगार की सीमाएँ हैं। शहरी बेरोजगारी को दूर करने के लिए, विशेषज्ञों द्वारा अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों की तरह शहरी क्षेत्रों में मनरेगा शुरू करने का सुझाव दिया जाता है। कुछ ने इसका प्रारूप भी प्रस्तावित किया है। सरकार को अपने स्तर पर नीतिगत व्यवहार्यता की जांच करनी चाहिए। एक सर्वे कहता है कि चार में से एक एमबीए, पांच में से एक इंजीनियर, दस स्नातक में से एक बेरोजगार रहता है। इसके रीजनिंग में जाने के बाद कई बातें साफ हो जाती हैं। उसके लिए केवल सरकारी या निजी संस्थानों को दोष नहीं दिया जा सकता। यह दुख की बात है कि कुछ क्षेत्रों में रोजगार है, लेकिन आवश्यक कौशल वाले उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हैं। अब इस चुनौती का मुकाबला शैक्षिक स्तर पर भी होना चाहिए। श्रम की मधुरता का कितना ही गान किया जाए, हमारे समाज में श्रम की संस्कृति को उपेक्षा, कुछ दंभ के साथ देखा और व्यवहार किया जाता है, जो बढ़ती बेरोजगारी का कारण भी है। बेरोजगारी में वृद्धि के पीछे एक बुनियादी कारण स्कूलों और यहां तक ​​कि पारंपरिक व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों में शिक्षा के बीच का बेमेल दूर करना और उद्योगों के अनुरूप  आवश्यक कुशल जनशक्ति  निर्माण की आवश्यकता है। नई शैक्षिक नीतियां इस समस्या को हल करने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, हर साल लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख नई मानव शक्ति रोजगार बाजार में प्रवेश करती है, इसका क्या किया जाए? इस बीच अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मंदी की हवा चलनी शुरू हो गई है। इसने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र को प्रभावित किया है, जिससे हजारों कुशल जनशक्ति बेरोजगार हो गए हैं। उस सेक्टर में नई नियुक्तियों का काम भी कछुआ गति से चल रहा है। 

स्टार्टअप्स, सप्लाई चेन, ई-कॉमर्स के साथ-साथ सर्विस सेक्टर जैसे उद्योगों को मुश्किलें हैं।हालांकि रिटेल, मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री, इंफ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री के मोर्चे पर संतोषजनक स्थिति है, लेकिन मंदी की वजह से निर्यात भी प्रभावित हुआ है। परिणामस्वरूप बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। डिप्लोमा धारकों और डिग्री धारकों के बीच बेरोजगारी दर 12-14 प्रतिशत है। अधिक गंभीर चुनौती शिक्षित हाथों के लिए काम की कमी है। इसलिए रोजगार पैदा करने वाले सेवा क्षेत्र के साथ-साथ विनिर्माण उद्योगों में निवेश पर जोर दिया जाना चाहिए जिससे रोजगार बढ़े। इसके अलावा, उद्योगों द्वारा आवश्यक कौशल के अधिग्रहण पर भी जोर दिया जाना चाहिए। सरकार द्वारा शुरू की गई पहल का दायरा बढ़ाना और युवाओं के खाली हाथों से इसका फायदा उठाना बेरोजगारी की समस्या का जवाब हो सकता है। -मच्छिंद्र ऐनापुरे, जत जि. सांगली